ग्रामीण विकास विभाग

  • राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी के " ग्राम स्वराज्य " की परिकल्पना के प्रति कटिबद्ध एवं प्रतिबद्ध राष्ट्र, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ से ही पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चरणबद्ध रूप में कल्याणकारी योजनाओं का सृजन करता हुआ उन्हे मूर्त रूप देने का भरसक प्रयास कर रहा है। गॉवों में बसने वाले भारत के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना तब तक साकार नहीं हो सकती जब तक कि गॉव एवं ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी जाती। इस तथ्य को मद्देनजर रखते हुये राज्य सरकार ने केन्द्र के समन्वय से पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से इस क्षैत्र पर विषेष ध्यान दिया है। आज राजस्थान देष के अन्य राज्यों की तुलना में तीव्र गति से नियोजित विकास करते हुये अग्रिम पंक्ति के राज्यों में अपना स्थान बनाने हेतु प्रयासरत है। स्वतंत्रता प्राप्ति के इन 60 वर्षों में राज्य ने विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुये विकास के अनेक सोपान चढते हुये कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं। एक ओर जहां राज्य सरकार विकास की गति को तीव्र से तीव्रतम करने के लिये प्रयत्नषील है वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक विपदाएं विकास में बाधक नहीं हो सके इस बाबत भी सजग एवं सचेत रही है।

    राज्य का अधिंकाष भू-भाग रेगिस्तानी होने के कारण सूखे एवं अकाल की विभीषिका से जूझता रहा है। इसके साथ ही संसाधनों की कमी एवं बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या भी सदैव बनी रही है। फलतः निर्धनता , बेरोजगारी और विषमता आदि समस्याओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सदैव आघात पहुंचता है। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राज्य सरकार ने गॉवों को न केवल विकास की मुख्य धारा से प्रत्यक्ष रूप से जोडा है, बल्कि ग्रामीण विकास हेतु विपुल संसाधन उपलब्ध कराकर ग्रामीण अंचलों में जनसुविधाओं का विस्तार , रोजगार के अधिक अवसर एवं गरीब परिवारों के आर्थिक स्तर में सुधार लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के तीसरे दषक से ही ग्रामीण क्षेत्र के योजनाबद्ध विकास ने नया मोड लिया और अति पिछडे तथा गरीबी से ग्रस्त परिवारों को सीधे लाभ पहुंचाने की दिषा में प्रयास किये गये , लेकिन राज्य में ग्रामीण विकास को और अधिक प्राथमिकता एवं विषेष महत्व देते हुए वर्ष 1971 में विषिष्ठ योजना संगठन की स्थापना की गई। वर्ष 1979 में पुर्नगठन के साथ-साथ इसका कार्य क्षेत्र बढ़ाकर इसे " विषिष्ठ योजनाएं एवं एकीकृत ग्रामीण विकास विभाग " का नाम दिया गया। 1 अप्रैल , 1999 से इस विभाग का नाम " ग्रामीण विकास विभाग " किया गया। ग्रामीण विकास विभाग द्वारा क्रियान्वित अधिकांष योजनाओं का क्रियान्वयन जिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से किया जा रहा है।

    अतः जिला स्तर पर समन्वय हेतु जिला ग्रामीण विकास अभिकरणों का जिला परिषद में विलय करते हुये मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अधीन ग्रामीण विकास प्रकोष्ठ का गठन किया गया। इसी तरह राज्य स्तर पर ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज की गतिविधियों में समन्वय स्थापित करने एवं कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन के उद्देष्य से ग्रामीण विकास विभाग एवं पंचायती राज विभाग का विलय किया गया है। वर्तमान में इस विभाग का नाम " ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग " है। राज्य में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग द्वारा जहां एक ओर ग्रामीण विकास की 20 एवं पंचायती राज की 9 से भी अधिक योजनाएं क्रियान्वित कर विकासात्मक असंतुलन को दूर करने और ग्रामीण क्षेत्रों को अपेक्षित प्राथमिकता देने की दृष्टि से स्थाई विकास को लक्ष्य में रखकर कमजोर और उपेक्षित वर्गो के विकास पर विषेष ध्यान दिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर संविधान के 73 वे संषोधन के उपरान्त नया पंचायती राज अधिनियम 1994 , 23 अप्रैल , 1994 से लागू कर राज्य में पंचायती राज को नया स्वरूप प्रदान किया गया है। जिसके तहत पंचायती राज संस्थाओं को अनेक अधिकार प्रदान किये गये है। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के अधीन ग्रामीण विकास की योजनाएं शासन सचिव , ग्रामीण विकास तथा पंचायती राज संस्थाओं के प्रषासनिक नियन्त्रण एवं योजनाओं का क्रियान्वयन शासन सचिव एवं आयुक्त, पंचायती राज के माध्यम से किया जा रहा है।


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